Monday, October 23, 2017

मां की रसोई मां की तरह एक ही होती है!

आज कल पब्लिक को इमोशनल ब्लेकमेल किया जाता है ... शहर में कितने ही होटल-रेस्टरां जिन का नाम ..मां की रसोई ... कईं जगहों पर मैंने ढाबे देखे ...जिन का नाम था .. हांडी... पता नहीं पंजाब में किसी ने कुन्नी के बारेे में सोचा कि नहीं..

अभी मैं बताऊंगा आप को कि आज अचानक मेरे को यह मां की रसोई वाली बात कहां से ध्यान में आ गई .. जब भी इस तरह की बात ध्यान में आती है तो मैं अपने विचार लिख लेता हूं...एक मेरा प्राईव्हेट ब्लॉग है ..मेरी स्लेट ... पहले तो यह पब्लिक था..लेकिन कुछ समय पहले मैंने इसे प्राईव्हेट किया है...मुझे ऐसा करना ज़रूरी लगा..

कल मैंने बहुत दिनों बाद उस मेरी स्लेट ब्लॉग पर कुछ लिखा ...यह एक तरह से डायरी जैसा ही है ...उसमें मैं देख रहा था मेरा छःमहीने पुराना एक लेख ..दुनिया की हर मां होती है बेस्ट कुक...


और अभी ध्यान आया कि बहुत साल पहले इसी ब्लॉग पर कुछ बातें और साझा करी थीं....शुक्र है रब्बा, सांझा चुल्हा बलेया... (इस लेख को आप इस लिंक पर क्लिक कर के देख सकते हैं)....मुझे पूरा ध्यान नहीं होता कि मैंने क्या लिख दिया होगा भावावेश में आकर ...लेकिन इतना इत्मीनान तो रहता ही है कि जो भी लिखा होगा सच ही लिखा होगा...झूठ-वूठ के चक्कर में मैं पड़ता ही नहीं। 

बोर्ड पर लिखा है कि खाना केवल कोयलों पर ही पकाया जाता है .. 
हां, तो भूमिका काफ़ी लंबी हो चली है .. अपनी बात शुरू करता हूं...तो दोस्तो हुआ यह कि आज बंबई में मुझे एक जगह एक रेस्टरां दिख गया जिस के बोर्ड पर लिखा हुआ था कि यहां पर सारा खाना केवल कोयले पर तैयार किया जाता है ...सोचिए, आप भी इस बारे में ..कि कोयला भी कैसी चीज़ हो गई ...गांव-खेड़ों में तो सरकार कोयले वाले चूल्हों से निजात दिला रही है ... और यहां मैट्रो शहरों के पॉश इलाकों में कोयले की आंच पर बने खाने की विशेष तौर पर मार्केटिंग की जा रही है ...

 खाने वाने का तो बाहर ऐसा है कि खाने पीने की कुछ जगहें ही होती हैं जो हमारे स्वाद और जेब के अनुसार हुआ करती हैं...कहने को तो पांच सितारा होटल भी हैं...लेकिन कम कहां उधर जाते हैं! 

कारण कुछ भी रहे हों...उनके बारे में सोचने की भी ज़रूरत है ...पहले जिस तरह का विश्वास हम लोगों को अपने बचपन में घर के आस पास के ढाबे पर हुआ करता था, उतना अब बडे़ बड़े रेस्टरां पर भी नहीं होता...मुझे तो अपने बारे में पता है ...मुझे नहीं होता है ... 

और बात रही .इमोशनल ब्लेकमेल की ..मां की रसोई, झाई की रसोई ......सीधी पक्की बात यह है कि मां की तरह ही मां की रसोई भी एक ही हुआ करती है ....इस लेख को पढ़ रहे दोस्त दो मिनट का ब्रेक लें....टीवी देखते हुए भी कितने ब्रेक लेते ही हैं आप ...एक ब्रेक मेरे कहने पर भी लीजिए....अपनी मां की रसोई को याद कीजिए....बचपन से लेकर आगे तक....आप मेरे से इत्तेफाक रखेंगे कि जब तक मैं की बाजू में रोटी बेलने की ताकत बची रही ..इस मां की रसोई ने ताउम्र निष्काम सेवा ही की ... सेवा शब्द भी इस समय कितना छोटा सा, कितना अदना सा लग रहा है ...कोई छुट्टी नहीं, कोई ब्रेक नहीं, कोई रेस्ट भी नहीं....कईं बार शब्द भी धोखा दे जाते हैं ऐन वक्त पर ...इस बात को यही छोड़ रहा हूं क्योंकि यह बात कहने की नहीं है, हमारे अनुभव की है ... 
पंजाबी सुपर-डुपर हिट गीत...कुलदीप मानक साहिब....मां हुंदी ए मां ओ दुनिया वालेओ....

पुष्पेश पंत एक बड़ा लेखक है .. खाने पीने के ऊपर उसने बहुत सी किताबें लिखी हैं... उसे सुन कर और पढ़ कर बहुत अच्छा लगता है ...एक बार मैंने उसे यह कहते सुना कि यह जो आटा गूंथने की मशीनें आ गई हैं..बेकार है....याद दिला रहा था कि कैसे आप की मां आटे को इत्मीनान से गूंथती रहती थी .. चूंकि वह पहलवान नहीं होती थीं...धीरे धीरे थोड़ा थोड़ा ज़ोर लगा कर गूंथती रहती थी .. और ऐसे गूंथे हुए आटे के गुण कितने अलग हो जाते हैं....उस की चर्चा कर रहा था....

हां, तो मां की रसोई की बात पर लौटते हैं... एक समय वह मां की रसोई होती है ...फिर धीरे धीरे कुछ कारणों की वजह से मां की पकड़ अपनी ही रसोई पर ढीली पड़नी शुरू हो जाती है ...कारण लिखने वाले नहीं होते, समझने वाले होते हैं, पढ़ने वाले कौन सा विलायत में रहते हैं....सब कुछ अनुभव करते हैं (बस घेसले बने हुए हैं!!) ....इस ढीली पकड़ के रहते भी वह कभी कभी हमें हमारे बचपन के दिनों के जा़यकों को फिर से चखा ही देती हैं ...होता है ना ऐसा ही ..


अभी मैंने एक रेस्टरां यह देखा .. तवा ... और एक बात, मुझे कुछ शहरों के लोगों की पेड़ों के साथ मुहब्बत देख कर बहुत अच्छा लगता है ....ये पेड़ भी हम लोगों की सामूहिक मांएं ही हैं....जो हमें ताउम्र बस देते ही देते हैंं....साफ-स्वच्छ हवा...छाया....खाना...फल-फूल....रूह को ठंडक....सब कुछ पेड़ों ही से तो आ रहा है ... क्या ख्याल है?