Thursday, August 17, 2017

स्वाईन फ्लू की रोकथाम कितनी आसान है!

वैसे तो सोशल मीडिया पर नींद खुलने से लेकर रात होने तक सारा दिन कुछ भी ठेला जाता है ...मैं इन सब से इतना ऊब चुका हूं कि लगभग ९० से ९५ प्रतिशत माल तो कभी खोलता ही नहीं...और पढ़ना भी नहीं हो पाता..इन की सच्चाई के ऊपर प्रश्नचिंह भी लगा रहता है ...और जहां तक ज्ञान की बातें हैं...वे भी इस उम्र तक अपने हिस्से की सीख ही चुके हैं...अब और नहीं चाहिए, कासा भर चुका है...ज़रूरत है तो बस अमल की ...जिस में अभी तक शून्य हूं...

लेकिन सोशल मीडिया पर कईं बार ऐसे संदेश आते हैं..जिन्हें आप तुरंत प्रसारित करना चाहते हैं...क्योंकि आप मैसेज भेजने वाले किसी डाक्टर मित्र को चालीस वर्षों से जानते हैं, आप को पता है कि वह बंदा बिल्कुल नो-नॉन सैंस तरह का है ...और वह किसी अन्य विशेषज्ञ की कही हुई कोई खा़स बात लिख रहा है तो फिर तो आप उस बात को अच्छे से पढ़ते हैं और एक एक शब्द का ध्यान रखते हुए उस का अनुवाद भी करने की कोशिश करते हैं....

ऐसा ही एक मैसेज मेरे एक डाक्टर मित्र ने कल फेसबुक पर स्वाईन फ्लू की रोकथाम के बारें में एक पोस्ट शेयर की थी...मैंने सोचा कि उसे आप सब के साथ एक ब्लॉग-पोस्ट के माध्यम से शेयर किया जाए.... (यह संदेश भी इंगलिश में था, मैंने उस को हिंदी में शेयर करने की यहां कोशिश की है...ज़रूरी लगा!)



स्वाईन फ्लू की इंफेक्शन के प्रवेश के दो ही रास्ते हैं... नथुने (nostrils) एवं मुंह/गला। हम लोग जितनी भी सावधानियां बरत लें लेकिन जब इस तरह का इंफेक्शन विश्व स्तर पर ही चल रहा हो तो H1N1 वॉयरस के संपर्क में आने से बच पाना लगभग नामुमकिन है, यह बात ध्यान से याद रखने योग्य है। एक बात ज़ेहन में और भी रखिए कि इस वॉयरस के संपर्क में आना इतना चिंता का कारण नहीं है, जितनी यह बात कि इस से संपर्क में आने के बाद इन वॉयरस पार्टिकल्स का तेज़ रफ़्तार से बढ़ना...

जब तक आप स्वस्थ हैं और आप में एच१एन१ इंफेक्शन के कोई लक्षण मौजूद नहीं हैं, तब भी इस वॉयरस की संख्या को बढ़ने से रोकने के लिए, लक्षण पैदा होने की रोकथाम हेतु और इस इंफेक्शन के साथ दूसरी तरह की मौकापरस्त इंफेक्शन (secondary infections) से बचने के लिए कुछ बिल्कुल साधारण से उपाय अपनाए जा सकते हैं... (अधिकतर सरकारी चिट्ठीयों में इन मामूली लेकिन बेशकीमती उपायों के बारे में लोगों को कम जागरुक किया जाता है)...सारा ध्यान बस N95 फेस मॉस्क और टैमीफ्लू के स्टॉक पर ही नहीं लगाए रखना चाहिए...

१. बार बार हाथ धोएं (इसे सरकारी संदेशों में रेखांकित किया जाता है)

२. हाथों को चेहरे से दूर ही रखें- जितनी भी तलब लगे, अपने हाथों को चेहरे पर बिना वजह न लगाते रहें...खाना, नहाना और चांटा लगाना इस के अपवाद हैं। (यह चांटा भी उस पोस्ट में लिखा हुआ है, इसे मैं नहीं जोड़ रहा हूं) हा हा हा हा हा...

३. नमक वाले गुनगुने पानी से दिन में दो बार गरारे करते रहें (अगर आप को नमक पर भरोसा नहीं है तो लिस्ट्रिन भी इस्तेमाल कर सकते हैं) ...एच१एन१ इंफेक्शन को गले अथवा नाक में शुरूआती इंफेक्शन के बाद पनपने और लक्षण पैदा करने के लिए दो तीन दिन का समय चाहिए होता है। साधारण से लगने वाले नमक वाले पानी के गरारे इस वॉयरस को आगे पनपने नहीं देते। आप इस बात को गांठ बांध लीजिए कि इस गुनगुने नमकीन पानी का सेहतमंद बंदे के ऊपर वैसा ही असर होता है जैसा कि किसी संक्रमित व्यक्ति के ऊपर टैमीफ्लू नामक दवाई का होता है ...इसलिए इस तरह के साधारण, आसानी से उपलब्ध और बेहद असरकारक उपायों को कम मत आंकें....ये भी बड़े काम की चीज़ें हैं..

थोड़ा मैं भी तड़का लगाता चलूं....आज सुबह यह गीत सुना है टीवी पर बहुत अरसे के बाद ...वही ज़ेहन में था....अचानक लगा कि अमिताभ नहीं यह बात नमक वाला गुनगुना पानी ही कह रहा हो कि हम हैं बड़े काम की चीज!!


४.हर रोज़ गुनगुने नमक वाले पानी से अपने नथुने ज़रूर साफ़ करें.. हरेक बंदा तो जल नेती और सूत्र नेति (जो नथुनों की सफ़ाई के लिए बहुत उम्दा योग क्रियाएं हैं) कर नहीं पाता, लेकिन नाक को थोड़ा ज़ोर लगा के (कह कहते हैं पंजाबी में सिड़कना या सुकड़ना) दिन में एक बार साफ़ करना और अपने नथुनों में नमकीन गुनगुने पानी में भीगी हुईं कॉटन-बड्स को हल्के से फेर देना भी वॉयरस की संख्या को कम करने का बेहद असरदार एवं सुगम तरीका है..

५. अपनी अच्छी इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को बनाए रखिए... उन सब खाद्य पदार्थों के सेवन से जिनमें विटामिन सी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है.. (आमला, सिटरेस ग्रुप के फलों के सेवन से).....लेकिन अगर आप को विटामिन सी के लिए भी सप्लीमैंट्स ही लेने पड़ रहे हैं तो सुनिश्चित कीजिए कि उस में जिंक भी हो ताकि वह शरीर में अच्छे से जज़्ब (absorption) हो सके। 

६. जितना चाहें गर्म पेय लीजिए (चाय, काफी)....(यह इंफेक्शन के सीज़न तक ही लागू होता है....बाकी तो आप सब समझते हैं..) इस बात को समझिए कि गर्म पेय पदार्थों को पीने से भी गरारे करने जैसा ही अच्छा असर होता है लेकिन उलट दिशा में ...इन गर्म पेय पदार्थों से तेज़ी से पनप रहे वॉयरस के जीवाणु  गले से पेट की तरफ़ सरक जाते हैं जहां पर ये संख्या में बढ़ना तो दूर, ज़िदा ही नहीं रह पाते...इसलिए इंफेक्शन से बचाव हो जाता है। 

 मुझे तो यह लेख बहुत उपयोगी लगा ...मैं इस में लिखी बातों पर ध्यान दूंगा....विशेषकर अकेले बैठे हुए यह जो नाक वाक में कभी उंगली डाल लेने की गंदी आदत है, मुझे इसे रोकना होगा, गरारे भी किया करूंगा और हां, नथुने रोज़ाना साफ़ करने वाली बात भी मैं अाज से शुरू करूंगा... How foolishly we take everything for granted, including our own health!

सोशल मीडिया पर भी दोस्त कभी कभी बहुत काम की बातें शेयर करते हैं....उम्मीद है आप भी इस से फ़ायदा लेंगे...

मेरी तरफ़ से सारी कायनात के लिए आज की यह अरदास....आज मैंने छुट्टी ली है, एक दो लोकल काम हैं...इसलिए अभी सुबह थोड़ी फुर्सत लगी तो यह लिख लिया ....हो सके या अगर आप को लगे कि आप के किसी अपने या बेगाने के लिए भी ये छोटी छोटी बातें काम की हो सकती हैं तो शेयर करिएगा... 

Tuesday, August 8, 2017

और ऐसे ही रेलवे अस्पतालों की लत लग जाती है !


रेलवे के एक सीनियर डाक्टर डा अनिल थॉमस ने सोशल मीडिया में कुछ दिन पहले अपने अनुभव इन शब्दों में साझा किए... (उन्होंने इंगलिश में लिखा था...लेकिन पता नहीं मैं कैसा टूटा-फूटा अनुवाद कर पाया हूं)... 

"आज का दिन काफ़ी व्यस्त था, ओपीडी का समय समाप्त होने में यही कुछ पौन घंटा रहता होगा... बरामदे में बहुत से मरीज़ अभी प्रतीक्षा कर रहे थे . मैंने अगले मरीज़ के लिए घंटी बजाई और एक ६३ वर्षीय पुरुष अपनी पत्नी के साथ कमरे के भीतर आया...उन्होंने बहुत अच्छे कपड़े पहने हुए थे ...और वे बढ़ती उम्र के साथ होने वाली आम शारीरिक समस्याओं के लिए मुझ से मशविरा करने आये थे, वह अकसर नियमित परामर्श लेने आते हैं।

इस बार उन्हें पेशाब की धार में कुछ समस्या थी पिछले पंद्रह दिनों से ..और दवाई से उन्हें कुछ आराम लग रहा था।

मैं अभी उनसे उन की तकलीफ़ के बारे में बात कर ही रहा था कि बीच में ही उस की पत्नी कहने लगी कि मैं तो इन्हें कहती हूं कि किसी अच्छे से मशहूर अस्पताल में चल कर दिखा लेते हैं ..और एक ऐसे ही अस्पताल में हमारी बेटी एंडोक्राईनोलॉजिस्ट  है और यही नहीं, इन का आठ लाख रूपये का मैडीकल इंश्योरेंस कवर भी है...

उस की पत्नी से इतनी जानकारी मिलने पर मुझे भी यह उत्सुकता हुई कि एक नामचीन अस्पताल में जाने की बजाए यह व्यक्ति इस पॉलीक्लिनिक में आना ही क्यों चुनता है? दोस्तो, उस पुरुष ने ऐसे कारण बताए जो किसी की भी आंखें खोलने के लिए काफ़ी हैं और जिस से रेलकर्मियों के रेल अस्पतालों में भरोसे और विश्वास की एक झलक मिलती है ...

१. वह ३६ साल तक रेलवे में लोकोपाइलट (ट्रेन ड्राईवर) रहा और इन ३६ सालों में वह एक बार भी कभी रेल अस्पताल के बाहर किसी चिकित्सक से परामर्श करने नहीं गया।

२.उस के दोनों बच्चों का जन्म भी रेलवे अस्पताल त्रिची में ही हुआ था।

३. बीस साल तक उस के दोनों बच्चों की सेहत की बेहतरीन देखरेख रेलवे के अस्पताल में ही होती रही।

४. २००४ में उस व्यक्ति की दोनों आंखों के मोतियाबिंद का आप्रेशन भी चेन्नई के बड़े रेलवे अस्पताल में हुआ।

५. उस की पत्नी जिसे मधुमेह है ..इस से आंखों पर किसी किसी को जो असर पड़ता है डॉयबिटिक रेटिनोपैथी...उस के लिए और ग्लुकोमा (काला मोतिया) के लिए यहां चेन्नई के हैडक्वार्टर अस्पताल के आंखों के विभाग में उस का लंबा और संतोषजनक इलाज चलता रहा।

६. हर महीने ये पति पत्नी आते हैं, लंबी कतारों में अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं और नियमित चलने वाली अपनी दवाईयां ले कर जाते हैं।

७. इस दंपति का बेटा गूगल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और बेटी एक एंडोक्राईनोलॉजिस्ट है ..ये दोनों अपने मां-बाप के लिए बढ़िया से बढ़िया अस्पताल में ऑनलाइन एप्वांयऐंट लेकर बिना फीस की परवाह किए...सब से बढ़िया इलाज चाहते हैं।

लेकिन इस पुरूष ने आगे कहा ...लेकिन हम लोग रेलवे अस्पतालों के साथ पिछले ४० बरस का नाता ऐसे कैसे तोड़ सकते हैं? हमें एक अपनेपन का अहसास होता है यहां जब हम डाक्टरों, पैरामैडीकल स्टॉफ एवं मरीज़ों में जाने पहचाने चेहरे दिखते हैं और हमें यहां घर जैसा माहौल मिलता है।  प्राईव्हेट अस्पताल अति उत्तम हैं भी अगर, तो भी हमें वहां पर ओपीडी में हमें अकेलापन काटता है और अनजान डाक्टरों से बात करने पर भी कुछ तो खालीपन खलता है।

यह बंधन तो प्यार का बंधन है ....

उस व्यक्ति ने जाते समय रेलवे के पुराने डाक्टरों के बारे में मेरे ज्ञान को टटोला, मेरे से अपनी हेल्थ-बुक और नुस्खा लिया और मुझ से हल्के से हाथ मिला कर और एक मुस्कुराहट बिखेरते हुए कमरे से बाहर चला गया...

मेरी यह पोस्ट उन सभी विशेष डाक्टरों, पैरामैडीकल स्टॉफ को समर्पित है जो रेल के मुलाजिमों और सेवानिवृत्त कर्मियों को ता-उम्र रेलवे चिकित्सा सेवा की लत लगाए अपने साथ जोड़े रखते हैं.."
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मुझे डा अनिल थॉमस की यह फेसबुक पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...जो शब्द किसी प्रोफैशनल के दिल से निकलते हैं वे किसी प्रशंसा के मोहताज नहीं होते और जब यह प्रोफैशन कोई डाक्टर हो तो क्या कहने! मैं इस पोस्ट के एक एक शब्द की ईमानदारी को तसदीक करता हूं क्योंकि पिछले २६ बरसों से मैं भी इसी व्यवस्था का हिस्सा रहा हूं..

पोस्ट पढ़ कर पिछले एक सप्ताह से लग रहा था कि इस पोस्ट को (जो अंग्रेजी में थी) हिंदी में लिख कर ज़रूर शेयर करूंगा..लेकिन बस, ऐसे ही आलस करता रहा .. इसे पढ़ने के बाद सोच रहा हूं कि हम सब को --सब से पहले पॉलिसीमेकर्स को, स्वयं चिकित्सकों को ...और किसी भी सरकारी विभाग में नये नये दाखिल हुए डाक्टरों, एवं लाभार्थियों (beneficiaries) को….यह पोस्ट गहराई से सोचने पर मजबूर करती है ... इस पोस्ट में बहुत गहराई है।

एक दूसरी बात का भी लिखते लिखते ध्यान आ रहा है ...कि यह तो थी एक ६३ साल के व्यक्ति की बातें जिसने हमें अपने फीडबैक से खरीद लिया ....अब सोचिए कि ७०-८० और ८५-९० साल के हो चुके रेलकर्मियों के पास इस तरह की हौंसलाअफ़जाई के लिए उनकी मीठी यादों के पिटारे के रूप में कितना बड़ा खजाना दबा पड़ा होगा....जिसे कभी किसी ने ताकने की भी कोशिश नहीं की....समय की कमी, झिझक या बहुत से दूसरे कारणों के रहते ....चलिए, इन से बात करते हैं .......क्योंकि बात करने से ही बात बनती है .....और यह बातचीत भी अपने जीवन की दूसरी पारी खेल रहे इन बेशकीमती शख्शियतों के समग्र इलाज (holistic health care) का एक हिस्सा भी है ...कोई कोयले झोंकता रहा बरसों तक, कोई स्टीम-इंजन की गर्मी सहता रहा ५८ साल की उम्र तक.... हमें अपनी मंज़िल तक पहुंचाने के लिए.....कोई भारी भरकम थैले उठा कर रेल लाइनों को ठोंक-पीट कर रोज़ाना देखता रहा .......अब इन के शरीर के कलपुर्ज़ों और नट-बोल्ट को दुरुस्त रखने की बारी हमारी है। क्या ख्याल है आपका?

 हाथों की चंद लकीरों का...यह खेल है सब तकदीरों का 

Tuesday, August 1, 2017

तरजीह

लखनऊ का दुर्गापुरी मैट्रो स्टेशन एरिया ..यह चार बाग रेलवे स्टेशन से महज एक किलोमीटर की दूरी पर होगा ..आलम बाग से चारबाग, हज़रतगंज रोड पर जाने वाली सड़क पर यह मैट्रो स्टेशन है ....इस स्टेशन के पास ही मुख्य रोड़ से अंदर जा रही सड़क की नुक्कड़ पर एक एटीएम है ...

कल मैं जैसे ही स्कूटर रोक कर एटीएम के अंदर जाने लगा तो उस एटीएम से चंद कदम दूर कुछ लोग जमा हुए दिखे...मैं भी वहां चला गया...

एक ५०-५५ साल का व्यक्ति बदहवास सा पड़ा हुआ था ...नीचे वाले होंठ के अंदर से खून बह रहा था ....उस के पास बैठे एक सज्जन के हाथ में रूमाल था, मेरे कहने पर उसने वह रूमाल उस चोटिल बंदे के होंठ पर रख दिया...खून तो दो तीन मिनट में बंद होना ही था ...

चोट लगा वह बंदा कुछ ठीक नहीं लग रहा था, बीच बीच में होंठ पर रखे रूमाल को देख रहा था ...और एक दो बार उठने की उसने कोशिश भी करी लेकिन लड़खड़ा सा गया... मैंने भी और वहां मौजूद लोगों ने भी उसे यही ताकीद की कि आप कुछ समय लेटे रहिए...

इतने में उस भीड़ में से ही किसी ने बताया कि कोई गाड़ी वाला टक्कर मार कर गया है ...एक शख्स ने धीमे से गाड़ी का नंबर भी बताया लेकिन किसी ने उस की बात की तरफ़ गौर ही नहीं किया...

मैंने पूछा कि गाड़ी वाला रुका नहीं, तो किसी ने कहा कि वह क्यों रूकेगा, आफ़त मोल लेने के लिए?  मैं चुप ।

इतने में उस ज़ख्मी व्यक्ति ने अपने जेब से कुछ कागज़ निकाले ...और उठने की कोशिश की उसने लेकिन उठ नहीं पाया...बदहवास था, मुझे ऐसा लगा जैसे किसी सगे-संबंधी को फोन करने के लिए कहेगा...लेकिन मैंने भी और दो तीन लोगों ने उसे यही कहा कि आप चंद मिनट लेटे रहिए....

पास ही उस का मोटरसाईकिल गिरा पड़ा था और एक हेल्मेट व बैग भी वहां पड़ा हुआ था ...

एक दो मिनट में ही वह उठ खड़ा हुआ...मन खुश हुआ कि चलो ठीक तो लग रहा है ... जब मैंने उसे फिर से कुछ समय लेटे रहने के लिए कहा तो उसने कहा कि उस का तो ट्रेन का आरक्षण है, उसे बदरीनाथ जाना है ...मुझे यह नहीं पता था कि वह किसी गाड़ी का बात कर रहा था, अपने गृह-नगर की बदरीनाथ धाम की .. लेकिन इस के बारे में उस से कुछ पूछा ही नहीं...बस, मैंने इतना कहा कि यह मुंह कटे-फटे की चिंता मत करिए, जल्द ही ठीक हो जायेगा सब कुछ...

उस व्यक्ति की ट्रेन पर जाने की बात सुन कर एक युवक बोल पड़ा ....ट्रेन तो फिर भी आयेगी। मैंने भी उस बात में हामी भर दी।

इतने में किसी ने पानी की बोतल उस व्यक्ति के मुंह के सामने कर दी ...कुल्ला करने के लिए ....मैंने समझाया कि बार बार कुल्ला मत करिए, थोड़ा पानी पी लीजिए...

भीड़ में से ही किसी ने कह दिया कि पानी मत पीना अभी....मुझे अजीब सा लगा, मैंने कहा कि मैं डाक्टर हूं ...इन्हें पानी पीने दीजिए...यह सुनने पर उसने पानी पिया...

तब तक वह उठ चुका था जैसे तैसे ....फिर उस की निगाह गई अपने मोटरसाईकिल पर ... शायद स्टार्ट करना चाह रहा था .....लेकिन आगे के पहिये के ऊपर लगा हुआ रिम टेढा़ हो चुका था ... कोई बात नहीं, एक युवक को अपने पैर से ज़ोर लगा कर उस रिम को सीधा करते देखा ..

मैं लिखते हुए यही सोच रहा था भीड़-तंत्र भी कभी समझ नहीं आ सकता ...उग्र भीड़ किसी राहगीर को अगर मौत के घाट उतारने की सज़ा दे देती है तो चंद मिनट में उसे निपटा भी देती है (अफसोस) और जब यही भीड़ किसी की विपदा में उस का हाथ थामने उमड़ पड़ती है तो बार बार यही लगता है कि इस भीड़ की प्रकृति तो यही है, आवारा भीड़ ज़रूर किसी के उकसावे में ही मार-धाड़ चीड़-फाड़ करती है ....

हां, तो उस के मोटरसाईकिल के अगले रिम को दुरूस्त होते देख मैं भी एटीेएम की तरफ़ लौट आया....भीड़ नहीं थी वहां बिल्कुल, मैं दो मिनट से भी पहले बाहर आया तो हादसे वाली जगह की तरफ़ देखा तो वह सुनसान पड़ी थी....कोई भी नहीं था वहां, मोटरसाईकिल भी नहीं ....

एटीएम के  बाहर खड़े गार्ड को मैंने ऐसे ही कहा कि बच गया बंदा, बहुत अच्छा हो गया....उसने बताया -- साब, यह इतनी तेज़  रफ्तार से इस अंदर वाली रोड़ से आ रहा था और गाड़ी के साथ इस की टक्कर इतनी भीषण थी कि यह हेल्मेट की वजह से बच गया, वरना इस का बचना ही मुश्किल था ....

जैसा कि अकसर होता है जब किसी को पता चलता है कि कोई डाक्टर है ...गार्ड ने भी पूछा- क्या आप डाक्टर हैं?
मेरे हां कहने पर उसने अपने पेट की तकलीफ़ बताई, मैंने दवाई लिखी और बरसात के मौसम में एहतियात बरतने की बात कही और वहां से अपने गंतव्य की तरफ़ आ गया...

सारा रास्ता में यही सोचता रहा था कि कैसे उस अनजान आदमी की तरजीह बदलती गईं.....पहले तो कुछ पल जान के ही लाले पड़े रहे,  फिर होंठ की चोट पर ध्यान आ गया ...कुछ राहत मिलते ही, इसी दौरान किसी सगे-संबंधी से बात करने की भी बात मन में आ गई...लेकिन बात की नहीं, थोड़ा सा संभलते ही आरक्षित रेल टिकट वाली गाड़ी छूटने की चिंता ने घेर लिया...और उठ खड़े होते ही अपनी मोटरसाईकिल की हालत की चिंता हो गई...

तरजीह की बात करें तो यही लगा कि हम सब की प्राथमिकताएं ऐसे ही पल पल बदलती रहती हैं...उस अनजान आदमी का व्यवहार भी बिल्कुल स्वभाविक था..उस की परिस्थिति में कोई भी होता तो यह सब कुछ ही करता...इसी तरह के निर्णय लेता .... ध्यान आ रहा है कि ढिठाई (ढीठपन) कह लें या हठ कह लें या एक आम आदमी की मज़बूरी, इस में फ़र्क कैसे पता चलता है...वैसे यह कभी भी न पल्ले पड़ने वाली बात है...चलो छोड़ो, आप भी इस चक्कर में मत पड़िए। 




चलिए, आज मेरी पसंद का एक गीत सुनते हैं...कितनी बड़ी सीख है इसमें भी, अगर हम किसी की बात सुनने की परवाह करते हों ...

Sunday, July 30, 2017

सरसों का तेल - हमारे दुःख सुख का सच्चा साथी

सुबह एक जगह खटमल का ज़िक्र हुआ...हमारे एक वाट्सएप ग्रुप पर ...बस फिर क्या था, सरसों का तेल ऐसे याद आया कि अभी तक उस से जुड़ी सभी यादें उमड़ पड़ी हैं...

बचपन के दिन भी क्या दीवानेपन के, बेपरवाह दिन हुआ करते हैं...

मुझे याद है कि खटमल जब भी लड़ते तो हमें तुरंत सरसों का तेल लगाने को दिया जाता ..बस, चंद ही लम्हों में हम अपना दुःख भूल जाते ..

दरअसल खटमल के काटने से चमड़ी जो थोड़ी सी उभर जाती है उसे धफ्फड़ कहते हैं... (पंजाबी में) ...इलाज तो मैंने बता ही दिया है ...धफ्फड़ ही नहीं, अगर मच्छर भी रात में काट रहे हैं, परेशान हो कर उठ बैठे हैं तो भी तेल की वह प्लास्टिक वाली शीशी ही काम आती थी...बडा़ सुकून मिल जाता था ...

अगर तितैया काट गया ... तो भी कटी हुई जगह पर लोहा रगड़ने के बाद तेल ही लगाना होता था ....

अब क्या क्या गिनाएं....झिझक भी होती है ... लेकिन मैं दूसरे लेखकों को पढ़ने के बाद थोड़ी हिम्मत करने लगा हूं ...बिंदास बात कहने लगा हूं ...सरसों के तेल की उपयोगिता चमूने लड़ने से लेकर कान और दांत में तेज़ दर्द में भी होती थी ...चमूने वाली परेशानी का मैं ज़्यााद वर्णऩ करने में असमर्थ हूं...जो भुक्तभोगी हैं वे सब जानते हैं....और कान में सरसों का तेल डालने से पहले उसे अंगीठी पर गर्म करते समय उस में लहसुन के दो टुकडे़ ज़रूर डाल दिये जाते थे ... कईं सालों बाद पता चला कि कान नाक के डाक्टर कहते हैं कि कान में कभी भी सरसों का तेल नहीं डालना चाहिए...लेकिन हमारे दोनों कानों में जब तक एक आध चम्मच तेल नहीं पहुंचता था, हमारी खारिश ही जाने का नाम न लेती थी ...

चलिए, पुरानी बातें को भी कितना याद करें....ऐसे ही कभी उमड़-घुमड़ आती हैं... बस, कहावत फिर वही याद आ जाती है कि अज्ञानता एक वरदान है .....यह कहावत बड़ी गहरी है, इसे सब लोग अपने अपने नज़रिये से पढ़ते हैं..

हां, जब हमें लासें पड़ जाती थीं....लासें (यह लाशें नहीं है, नोट करिए) ठेठ पंजाबी का शब्द है, इस का मतलब जब उमस आदि का मौसम हो ज़्यादा पसीना आता है तो हमारी साइडें लग जाती हैं...मतलब यह की हमारी जांघों के अंदरूनी हिस्सों में खारिश, लाली ...बस यह सब होने लगता है ...कईं दिन तक परेशानी का सबब...हमारे बचपन के दिनों में ये कैंडिड -इचगार्ड आदि कुछ भी नहीं था....क्या पता होता भी होगा, हमारी ही पहुंच से दूर होगा......चलिए, जो भी हो, हमें तो इस का सीधा इलाज समझाया गया था...कि रात को स्नान करने के बाद, सरसों का तेल चुपड़ लिया जाए, और सब से खुला पायजामा पहन कर सो जाया जाए......सच्ची यार, अगली सुबह ऐसे लगता था जैसे कुछ हुआ ही न हो। हैरान होता हूं कि पिछले दौर के लोग भी बहुत जुगाड़ू थे ..

कोई किसी को चोट लग जाए, कोई किसी को अंदरूनी चोट हो....हर एक के मुंह पर सब से पहले सरसों का तेल ही आता था....फर्स्ट एड कह ले ंया मरीज़ का ध्यान बंटाने के लिए या प्लेसिबो इफेक्ट कह लें.....कुछ भी कह लेते हैं क्योंकि अब कुछ कहने लिखने की और शायद उन बातों की थोड़ी खिल्ली भी उड़ाने की थोड़ी औकात हो गई है ......लेकिन याद है अच्छी तरह से जब केवल और केवल एक सरसों के तेल का ही सहारा हुआ करता था...

सिर पर भी रोज़ यह तेल चुपड़ा जाता था ...और कईं हफ्तों बाद इस से अपनी मालिश भी खुद करनी होती थी ...विशेषकर रविवार के दिन धूप में बैठ कर ..नहाने से पहले ....सिर पर कईं बार मां या बहन चंपी कर दिया करते थे..

बहुत से मरीज़ आते हैं जो कहते हैं कि हम लोग दांतों और मसूड़ों पर कड़ुवा तेल (यहां यू.पी मे इसे कड़ुवा तेल कहते हैं...कड़वा कहते हैं या कड़ुवा ...लेकिन उनके बोलने पर मुझे कड़ुवा ही सुनता है)..लगाते हैं, मालिश करते हैं मसूड़ों की उस से, बस उसी की वजह से दांत कायम हैं..

शरीर में कहीं भी शुष्कता लगे ...पंजाबी में कहते हैं खुश्की, तो भी यही तेल झस (लगा) दिया जाता था...और हां, सर्दियों में अकसर उन दिनों हमारे पैरों की अंगुलियां लाल हो जाती थीं, सूज जाती थीं...तब हमें गर्म पानी में सरसों का तेल और नमक डाल कर एक बड़े से पतीले में दिया जाता था...हम उस में पांच दस मिनट पांव रखे रहते, तोलिये से सुखा कर और जुराबें डाल कर सो जाते ...और सुबह एक दम चकाचक ....सब कुछ ठीक हुआ होता था...

मैं अपने दोस्तो ं से शेयर कर रहा था कि हमारे दिनो ं में तो भाई सरसों के तेल का संजीवनी बूटी जैसा मान सम्मान था... समय बदलता है तो लोगों की आदतें भी बदलने लगती हैं...स्वभाविक है ....वरना हमारे दिनों में तो फर्स्ट एड ही बस यह थी ... सरसों का तेल, मीठा सोड़ा (बेकिंग सोड़ा) पानी के साथ अगर कभी अफारा हो जाए... और सिरदर्द होने पर टूंडे (excuse me, हम उसे ऐसे ही बुलाते थे) की दुकान से एक सैरीडोन, पेट दर्द होने पर अजवाईन- नमक की पानी के साथ फक्की, और मां के दांतदर्द के समय बाज़ार से नसवार (powdered tabacco) लाना और पापा के दांत के दर्द के इलाज के लिए बाहर आंगन से गर्मा-गर्म ईंट के एक टुकड़े को उन्हें लाकर देना....सेंकने के लिए...

हां, सरसों के तेल की कुछ बातें और याद आ गईं... घर में कोई ताला नहीं खुल रहा, कोई कील-पेंच जाम हो गया तो वही सुपरहिट फार्मूला ....हिदायत दी जाती ऊपर से ...डाल दो इस ताले (जंदरे) में तेल और पड़ा रहने दो ....अपने आप रवां हो जायेगा....और पता नहीं फिर होता था कि नहीं, लेकिन जब कभी उस जंदरे को रिपेयर करने के लिए बाज़ार लेकर जाया जाता तो ताले वाले की फटकार ज़रूर सुनने को मिलती कि आप लोग तालों में सरसों का तेल क्यों डाल देते हो? मत किया करो यह कारस्तानी, खराब कर देता है यह ताले को।

ध्यान आ रहा है कि घर में छोटी सी एक पीतल की या कांसे की (कांसे को पंजाबी में कैं कहते हैं क्या, मुझे पता नहीं) कटोरी तेल के साथ हर समय तैयार ही रहती थी ....याद आ गया लिखते लिखते कि कभी साईकिल भारी चल रहा होता था तो साईकिल की चेन को भी इसी सरसों के तेल की चंद बूंदों का टॉनिक पिला दिया जाता था ... हा हा हा हा हा ....साईकिल की गरारी भी रवा हो जाती थी ........हा हा हा हा हा हा ... और वह हल्का चलने लगता था बिना ज़्यादा शोर शराबे के।

और हां, जब यह सरसों का तेल चोट, खरोंच या चमूनों-वूनों पर लगता था और चीखें निकलती थीं और कोई न कोई यह कह कर ढाढस भी बंधा देता था ....इस का मतलब खरा (शुद्ध) है, इसलिए लगेगा तो...लेकिन देखना आराम भी तुरत-फुरत आ जायेगा... हां भई हां, और होता भी ऐसा ही था .....  As I always say......Good Old Days!



Thursday, June 29, 2017

किस भाषा में लिखें?

मुझे १५ साल पहले एक नवलेखक शिविर में एक विद्वान की यह बात सुनने का मौका मिला था ..कि हमें अपनी मातृ-भाषा में भी ज़रूर लिखना चाहिए....सोचा उस समय इस के बारे में लेकिन कभी इस बात को गंभीरता से लिया नहीं शायद..

वहां से लौटने के बाद मैं अखबारों के लिए लेख लिखता रहा ...अधिकतर हिंदी में और यदा कदा पंजाबी में....इस के पीछे मेरी यही सोच थी कि पंजाबी अखबारों की रीडरशिप कम है...

२००७ से केवल ब्लॉगिंग कर रहा हूं....अधिकतर हिंदी में ...१० साल हो गये ...१५०० के करीब लेख हो गये...इसी दौरान २०१० के आसपास इंगलिश में भी ब्लॉगिंग शुरू की ...यही कोई तीन चार साल तक की ( चार सौ के करीब लेख) ... अभी भी कभी कभी कोई टैक्नीकल बात कहनी हो तो इंगलिश में ही लिखता हूं...उस के बहुत से कारण हैं...अभी उस में नहीं जाते। 
हिंदी और पंजाबी वाली बात तक ही अपनी बात को सीमित रखता हूं...एक है राष्ट्र भाषा और दूसरी मातृ-भाषा...दोनों का अपना अपना महत्व है..

कल मैं टीवी में प्रधानमंत्री मोदी का नीदरलैंड के हैग में हिंदुवंशियों के समूह में दिये गये भाषण को सुन रहा था...सही बात कही कि कुछ लोग बड़े गर्व से कहते हैं कि उन के बच्चों को भारतीय भाषाएं आती ही नहीं हैं.. ऐसे में १५० साल पहले गये सुरीनाम जा बसे भारतीयों ने तीन चार पीढ़ियों के बाद भी जैसे अपने देश का सभ्यता, संस्कृति को संजो कर रखा है, उस की मोदी तारीफ़ कर रहे थे...

कुछ सप्ताह पहले एक बुक-फेयर में मुझे बलराज साहनी साहब की एक छोटी सी किताब मिल गई थी ...साहित्यकारों के नाम संदेश...उसमें भी यही संदेश था कि हमें अपनी मातृ-भाषा में भी ज़रूर लिखना चाहिए... अच्छा लगा था उस किताब के शुरूआती आठ दस पेज़ पढ़ कर ..अभी पूरी नहीं पढ़ी लेकिन बात पल्ले पड़ गई।

इस में कोई शक नहीं कि बहुत से लोग बच्चों को अपनी मातृ-भाषा में बात करते समय टोकते हैं...इस के बारे में क्या लिखूं, इस के बारे में हम सब लोग अच्छे से जानते हैं कि पंजाबी जैसी भाषायें धीरे धीरे लोग आज की युवा पीढ़ी कम बोलती है...मुझे यह बड़ा अजीब लगता है ...ऐसा नहीं होता कि आप १५-२० साल की उम्र में बच्चों को कहना शुरू करें कि भई, पंजाबी में बात किया करो...और वे ऐसा कर पायेंगे....मुश्किल काम होता उन के लिए भी।

यह तो है बोलने वाली बात ...लिखने की तो बात ही क्या करें!

ज़्यादा बात को खींचने की बजाए, मैं सीधा बात पर आता हूं कि मुझे लगता है कि मैंने पंजाबी में बहुत कम लिखा ...शायद इस का एक कारण यह था कि जब मैं हाथ से लिख कर अखबार में लिख कर भेजता था तो ठीक था, लेेकिन जब से मैंने कंप्यूटर पर काम करना शुरू किया तो मैंने नोटिस किया कि पंजाबी के कुछ शब्द मेरे से लिखे नहीं जा रहे थे क्योंकि मेरे को बिंदी-टिप्पी-अध्धक कंप्यूटर में इस्तेमाल करने मुश्किल लग रहे थे.....बस, ऐसे में धीरे धीरे पंजाबी लिखना कम से कम ब्लॉगिंग में छूट गया....लेकिन मुझे इस का बहुत मलाल है...

जो हमारी मातृभाषा होती है उस में हम सोचते हैं....और अगर उसी में लिखते-पढ़ते हैं तो यह सब बहुत नेचुरल होता है ... जद्दो-जहद नहीं करनी पड़ती।

सही में अगर मौलिकता की, सर्जनात्मकता की बात करें तो वह मातृ-भाषा में लिखते समय स्वतः आयेगी...और अगर अच्छा लिखा होगा तो उसका अपने आप बीसियों भाषाओं में अनुवाद भी हो जायेगा... लिखते समय कभी इस सिरदर्दी की चिंता मत करिए, यह दूसरों के लिए छोड़ दीजिए..बस, आप तो अपनी कह के मुक्त हो जाइए....

हिंदी में लिख तो लेता हूं ...कईं बार शब्दों की वजह से अटक जाता हूं... अपनी बात कहने के लिए वह शब्द नहीं मिल पाता जो मेरे मन के भाव प्रकट कर सके..और अगर मैं जबरदस्ती वहां कोई शब्द हिंदी का फिट कर भी देता हूं तो वह बात बनती नहीं.
मुझे शुरू शुरू में यही लगता था कि हिंदी बड़ी शुद्ध लिखनी चाहिए.. लेकिन ऐसा शायद हो नहीं पाता...हम वही हिंदी लिख पाते हैं जो हमें आती है ...हम वही शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं जिन के इस्तेमाल के बारे में हमें पता है ...ऐसे ही धक्के से कुछ शब्द इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं तो फिर गड़बड़ हो जाती है....

मैं अकसर देखता हूं कि हिंदी लेखकों की कहानियां या हिंदी का कोई भी साहित्य पढ़़ते समय मैं कईं शब्दों पर अटक जाता हूं....फिर अनुमान लगाने लगता हूं...यह कहना आसान है कि उसी समय शब्दकोष देख लेना चाहिए, ऐसा नहीं हो पाता मेरे साथ..बस, इसी चक्कर में कुछ ही पन्ने पढ़ कर वह किताब अलमारी में वापिस सरका दी जाती है ...

लेकिन अगर मैं उन लेखकों की हिंदी कहानियां पढ़ता हूं जिन की मातृ-भाषा पंजाबी है तो मैं उन्हें बेहतर तरीके से पढ़ पाता हूं...कुछ शब्दों पर अटकता हूं क्योंकि लेखक जिस भी परिवेश में पले-बढ़े हैं, कुछ शब्द वहां से भी साथ जुड़ ही जाते हैं...लेकिन फिर भी ऐसे लेखकों को पढ़ कर मेरी कमज़ोर हिंदी की हीन-भावना समाप्त होती दिखती है क्योंकि मुझे लगता है कि यह तो मेरी हिंदी से मिलती-जुलती हिंदी ही है ...

कुछ हिंदी के लेखकों को पढ़ता हूं तो ज़्यादा समझ ही नहीं पाता...भारी भरकम शब्द ....मुझे कईं बार लगता है कि ये भारी भरकम शब्द कहीं जानबूझ तो इस्तेमाल नहीं किया जाते होंगे...अपनी अच्छी हिंदी को दिखाने के लिए...लेकिन जो भी हो इस से पढ़ने समझने में मुश्किल होती है ....इसी चक्कर में मैं हिंदी की कविताएं तो बिल्कुल भी समझ ही नहीं पाता....वही समझ में आईं जो स्कूल में मास्टरों ने डंडे के ज़ोर पर समझा दी, बाकी सब गोल।

तकनीकी शब्दावलियों को देखता हूं तो डर जाता हूं ...इतने भारी भरकम शब्द ...कोई कैसे इन शब्दों को समझेगा...इसीलिए हम लोग अपनी मातृ-भाषा में तो दूर अपनी राष्ट्र-भाषा में तकनीकी विषयों को पढ़ा नहीं पा रहे हैं.....और जो देश ऐसा कर रहे हैं वे तारीफ़ के काबिल हैं..

मैं भाषा विज्ञानी नहीं हूं ..जो समझा हूं वही लिखने की कोशिश कर रहा हूं....हां, कठिन शब्दों से याद आया कि लेखक के परिवेश का और उसने किस दौर में लेखन किया, इन सब बातों का भी असर तो साहित्य पर पड़ता ही है ..मैं कल मुंशी प्रेमचंद की कुछ कहानियां पढ़ रहा था ...कुछ शब्द मेरे सिर के ऊपर से ही निकले जा रहे थे।

ऐसा भी नहीं है कि हिंदी में ही यह समस्या है ...अकसर ऐसा भी होता है कि पंजाबी में भी किसी लेखक को पढ़ते हुए कुछ शब्दों पर अटक जाता हूं लेकिन वहां पर वह फ्लो खंडित नहीं होता क्योंकि वहां पर मैं आराम से कयास लगा लेता हूं...
अब ये सब बातें लिख कर ऊबने लगा हूं....लेकिन एक मशविरा तो है कि हमें अपनी मातृ-भाषा में लिखना-पढ़ना हमेशा जारी रखना चाहिए....हम सोशल मीडिया पर आडियो मैसेज तो दूर टैक्स्ट मैसेज भी मातृ-भाषा में नहीं करते ....बात भी मातृ-भाषा में नहीं करते ...और बात करते हुए भी अपने स्कूल कालेज के साथियों को भी "जी..जी " मिमियाने लगते हैं....मुझे इस से बड़ी नफ़रत है .....अगर हम स्कूल कालेज के दौर के ही अपने साथियों को व्हीआईपी ट्रीटमैंट देने लगते हैं तो इसके कईं मतलब हैं...उन के बारे में आप स्वयं सोचिए.......लेेकिन मुझे किसी भी स्कूल कालेज वाले दौर के साथी को जी लगा कर बुलाना बड़ा अजीब लगता है और मैं ऐसा अकसर नही ंकरता ....जहां मुझ से ऐसी एक्सपैक्टेशन भी होती है ...मैं वहां से गोल ही हो जाता हूं..

अपनी मातृ-भाषा में लिखने-पढ़ने का मजा ही कुछ और है ...जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा है कि वहां पर भी कुछ शब्दों में मैं अटक जाता हूं....इस का कारण वही है कि उस लेखक का अपने समय का परिवेश अलग होता है ....कल मैं डा महिन्द्र सिंह रंधावा की आपबीती पढ़ रहा था ..किसी पंजाबी की किसी स्कूल की किताब में प्रकाशित हुई है....पढ़ कर ऐसा लगा कि मैं उन से बातचीत कर रहा हूं...मेरे विचार में यह एक महान् लेखन के लक्षण हैं....और उन्होंने लिखा भी इतनी बेबाकी से था ....डा रंधावा साहब के बारे में अगर आपने नहीं सुना तो यह आप के सामान्य ज्ञान पर ही प्रश्न चिंह लगाती है ....यह देश की एक महान हस्ती हुई हैं ...विकिपीडिया पर इन के बारे में यहां जानिए... डा महेन्द्र सिंह रंधावा 

डा रंधावा साहब की पंजाबी भाषा में लिखी उस आपबीती से चंद पंक्तियां हिंदी में अनुवाद कर के लिख रहा हूं..
 'जून १९३० में मैंने एमएससी आनर्जड बॉटनी पहली श्रेणी में पास की। अब गांव आने के बाद यह सूझ ही नहीं रहा था कि कौन सा काम किया जाए जिस से कि गुज़ारा हो पाए। खेती बाड़ी में बड़ी डिप्रेशन थी और गेहूं डेढ़ रूपये में चालीस किलो के भाव से बिक रही थी।शहरों के लोग तो खुश थे कि गेहूं सस्ती है लेकिन किसानों का बहुत बुरा हाल था। तंग आ कर खेती-बाड़ी में उनका रूझान कम हो रहा था क्योंकि उन्हें उन की मेहनत का सिला नहीं मिल रहा था। फ़ालतू अन्न लोग पशुओं और कुत्तों को खिला रहे थे। गांवों के कुत्ते रोटियां खा खा के तगड़े होते जा रहे थे और दिन-दिहाड़े लोगों पर हमला कर देते थे। इस डिप्रेशन का बाकी काम-धंधों पर भी बड़ा बुरा असर पड़ा और कहीं कोई नौकरी नज़र नहीं आ रही थी।'
लेख बंद करते समय बस यही कहना है कि हिंदी भी पढ़िए, इंगलिश भी पढ़िए...लिखिए....इस के आधार पर विश्व मार्कीट में अपनी विशिष्टता दिखाईए.....लेकिन अपनी मातृ-भाषा को नज़र-अंदाज़ मत करिए....यह मैं किसी भी कट्टरवाद से प्रेरित हो कर नहीं कह रहा ..वह मेरा विषय कभी था ही नहीं और ना ही होगा....लेकिन मातृ-भाषा के अधिक उपयोग से हम अपनी बात को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर पाते हैं....हमें मन की बातें कहने के लिए शब्द ढूंढने नहीं पड़ते ...मैंने भी सोचा है कि अब पहले से अधिक पंजाबी साहित्य और पंजाबी साहित्यकारों को तवज्जो दूंगा...सोशल मीडिया पर भी मैं पंजाबी जानने वाले अपने साथियों और परिवार के सदस्यों के साथ पंजाबी लिख कर ही बात कहना पसंद करता हूं...पंजाबी गुरमुखी लिपि में लिखी हुई..

बात तो लंबी हो गई पता नहीं अपनी बात ठीक से कह पाया हूं कि नहीं......शायद थोड़ी बहुत तो हो ही गई बात ....और एक बात कि अपनी मातृ-भाषा में लिटरेचर पढ़ने की शुरूआत ऐसे करें कि स्कूल की पंजाबी की पाठ्य-पुस्तकें पढ़ते रहा करें...नेट पर भी पीडीएफ फोर्मेट पर पड़ी हुई हैं.....लेेकिन मेरी तरह इन्हें स्लीपिंग पिल की तरह मत इस्तेमाल करिए...थोड़ा समय रोज़ाना ऐसे साहित्य के साथ बिताइए.....यकीन मानिए यह हमारी मानिसक सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है...

एक छोटी सा बात जाते जाते कि हम लिखते इसलिए हैं कि जो कोई भी पढ़े उसे समझ में आ जाए...फिर अपनी बात किसी भी भाषा में इतनी घुमावदार ढंग से क्यों कही जाए...बस, इतना सा ध्यान रहे ...और लिखते समय भी यही ध्यान रखा जाए कि पढ़ने वाला कहीं भी अटके नही...हम क्यों नहीं बातचीत वाली भाषा में लिख पाते! लिखने वाले सोचिएगा...मातृ-भाषा की बात ही अलग होती है...उसे सुप्त मत होने दीजिए....जहां तक हो सके। फैशन के लिए कभी कभी एक दो जुमल मातृ-भाषा में बोल कर इसे उपहास का माध्यम न बनाएं, दिक्कत हमें और आने वाली पीढ़ियों को ही होगी।




Sunday, June 25, 2017

लाहौर में कोहिनूर

आज इस शीर्षक के साथ हिन्दुस्तान में एक लेख प्रकाशित हुआ है ....साथ में महाराजा रंजीत सिंह की फोटो थी...उस लेख को जब पढ़ा तो बड़े रोचक तथ्यों का पता चला...जिन्हें यहां शेयर कर रहा हूं...


कोहिनूर के सभी स्वामियों की तुलना में इसका सबसे ज्यादा महाराजा इस्तेमाल रणजीत सिंह ने किया। कोहिनूर से उन्हें जुनून की हद तक मोहब्बत थी, और हर सार्वजनिक मौके पर वह उसे जरूर पहनते थे।

उन्हीं के शासनकाल में पहली बार कोहिनूर ने अपनी अलग पहचान बनाई जो अब तक बरकरार है। नादिर शाह और दुर्रानी के वंशजों ने इसे हमेशा किसी दूसरे कीमती पत्थर, मुगलों ने इसे खास तैमूरी माणिक्य के साथ पहना, नादिर शाह ने जिसे एजुल हूर और दुर्रानियों ने फखराज कहा था। पर अब कोहिनूर अकेले रणजीत सिंह के गले की शोभा बनकर उनके संघर्षों और आजादी के लिए लड़े गए मुश्किल युद्धों का प्रतीक बन चुका था।

दुर्रानी वंश के इस हीरे को हासिल करने को रणजीत सिंह ने अपनी सफलता के चरमोत्कर्ष का प्रतीक चिन्ह मान लिया था। दरअसल वह कोहिनूर को एक ऐसी मोहर मानते थे, जो यह साबित करती कि लड़खड़ाते दुर्रानी वंश के खात्मे का सारा श्रेय उन्हीं को जाता है। शायद यह एक बड़ी वजह रही होगी जिसने महाराजा रणजीत सिंह को हर मौके पर कोहिनूर पहनने की प्रेरणा दी।


जब रणजीत सिंह ने वर्ष 1813 में इस महान हीरे को हासिल किया, तो उन्हें शक था कि शाह शुजा उन्हें बेवकूफ़ भी बना सकता है। यही वजह थी कि उन्होंने तुरंत लाहौर के सारे बड़े जौहरियों को बुलाया और हीरे की प्रामाणिकता की जांच करने का आदेश दिया। उन्हें तब बड़ी राहत मिली और थोड़ी सी हैरानी भी हुई. जब सभी ने इसे खालिस खरा और बेशकीमती करार दिया।

एक पुराने दरबारी ने बाद में इस घटना को याद करते हुए लिखा है - महाराज जब महल लौटे तो उन्होंने दरबार बुलाया। कोहिनूर हीरे का प्रदर्शन किया गया और वहां मौजूद सभी सरदारों, मंत्रियों और विशिष्ट लोगों को इसे देखने का मौका दिया गया। सभी ने बार-बार महाराजा को इस अमूल्य रत्न के हासिल होने पर बधाई दी।

अगले दो दिनों तक रणजीत सिंह ने लाहौर के जौहरियों से इसकी प्रामाणिकता की जांच करवाई।

इसके बाद जब महाराजा इस बात से पूरी तरह से संतुष्ट हो गए कि जो हीरा उनके पास है वह असली कोहिनूर है तो उन्होंने शाह शुजा को सवा लाख रूपए दान में भिजवा दिए। महाराज इसके बाद अमृतसर गये और तुरंत ही अमृतसर के मुख्य जौहरियों को बुलवा भेजा, जिससे यह पता लग सके कि लाहौर के जौहरियों ने कोई गलती तो नहीं की और इस हीरे का असली मूल्य क्या है। उन जौहरियों ने कोहिनूर की ठीक से जांच की और जवाब दिया कि इस बड़े आकार के बेहद खूबसूरत हीरे की कीमत के आगे हर आंकडा़ बौना है। महाराज चाहते थे कि हीरे को कुछ इस शानदार अंदाज और तरतीब से रखा जाए जिसे दुनिया सराहे। वह हीरे को अपनी आंखों से दूर नहीं होने देना चाहते थे। यही वजह थी कि यह काम भी जौहरियों को महाराज की मौजूदगी मे ंही करना पड़ा।

यह काम पूरा हुआ, रणजीत सिंह ने कोहिनूर को अपनी पगड़ी के सामने की तरफ़ लगवाया, हाथी पर सवार हुए और अपने सरदारों ओर सहायकों के साथ शहर के मुख्य मार्ग पर कईं बार-बार आए-गए। कोहिनूर को रणजीत सिहं हर दीवाली, दशहरा और त्योहारों पर बाजूबंद की तरह पहनते थे। उसे हर उस खास व्यक्ति को दिखाया जाता जो दरबार आता था, खासकर दरबार आने वाले हर ब्रिटिश अफसर को। महाराज रणजीत सिंह जब भी मुलतान, पेशावर या किसी जगह दौरे पर जाते, वह अपने साथ कोहिनूर को ले जाते थे।

इसके थोड़े ही दिन बाद महाराजा ने हीरे की कीमत जानने के लिए हीरे के पुराने स्वामियों और उनके परिवारों से दोबारा संपर्क करना शुरू कर दिया। वफा बेगम ने उन्हें बताया - 'अगर कोई बेहद ताकतवर व्यक्ति एक पत्थर को चारों दिशाओं में फेंके और पांचवा पत्थर हवा मे ऊपर की ओर उछाल दिया जाए तो इन सारे पत्थरों के बीच भरे गये सोने-चांदी और जवाहरात का कुल मूल्य भी कोहिनूर की बराबरी नहीं कर सकेगा।'

महाराजा को पूरे जीवन इस बात की चिंता रही कि उनका यह बेशकीमती पत्थर कोई चुरा न ले। 

जब रणजीत सिंह इस हीरे को नहीं पहनते तो उसे गोबिंदगढ़ के अभेद्य किले के राजकोष में बहुत ही तगड़ी सुरक्षा के बीच रखा जता। महाराजा ने बहुत से राज्यों की यात्रा की थी और हर जगह इसे लेकर भी गए थे।

कोहेनूर का वह रखवाला 

महाराजा के अलावा मिश्र बेली राम ही पूरे राज्य में वह दूसरा व्यक्ति था, जिसे कोहेनूर के प्रबंधन के सर्वाधिकार मिले थे। मिश्र बेली राम हमेशा कोहिनूर के मोती जड़े हुए शानदार डिब्बे को अपने हाथों मे ही रखता था। जब महाराज अपने कामकाज या किसी और वजह से राजमहल से दूर होते तो बेली राम ही महाराजा की शानदार और संवेदनशील अमानत का ख्याल रखता .. बेली राम इस दौरान कोहिनूर को एक साधारण से दिखने वाले डिब्बे में रखता था .. इसके साथ ही ठीक वैसे ही डिब्बों में कोहिनूर के शीशे के दो प्रतिरूप भी रखे जाते थे। अगर महाराज का शाही लश्कर कहीं रात्रि प्रवास करता तो तीने बक्से बेली राम के पलंग से जंजीर के जरिए बांधे जाते।

यात्रा के दौरान भी उन्होंने इसकी सुरक्षा व्यवस्था के लिए कई नायाब तरकीबें ईजाद की थीं। यात्रा के दौरान चालीस ऊंट और उन पर एकदम एक तरह के बक्से रखवाए जाते थे। किसी को नहीं पता होता था कि असली कोहिनूर किस बक्से में रखा गया है। यह बात और थी कि आमतौर पर हर समय सुरक्षाकर्मियों के ठीक पीछे वाले यानी पहले ही बक्से में कोहिनूर रखा जाता था, पर इस बात की सख्त गोपनीयता बरती जाती कि कोहिनूर का असली बक्सा किसी को न पता चले।

महाराजा को पहनने या यात्रा में न होने की दशा में कोहिनूर को गोबिंदगढ़ के तोशाखाने में कड़ी सुरक्षा के बीच रखा जाता था। कश्मीर से लेकर पंजाब तक महाराजा रंजीत सिंह के राज्य में करीब एक करोड़ तीस लाख लोग रहते थे और वह अपनी प्रजा के बीच बहुत ही लोकप्रिय थे।
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लेख थोड़ा आधा अधूरा सा इसलिए लगा कि आप कोहिनूर जैसे हीरे के बारे में रविवारीय अंक में लिख रहे हैं तो कुछ तो इस के बारे में भी लिखिए कि यह हीरा फिरंगियों तक कब और कैसे पहुंचा ...और आज यह किस के सिर का ताज है...और पीछे कुछ चर्चा हो रही थी ...पता नहीं राजनीति थी कि असलियत थी कि कोहेनूर को वापिस लाने की भी कुछ तिकड़म चल रही है...क्या पता कभी हमारी यह भी हसरत पूरी हो जाए....तब तक अच्छे दिनों से ही काम चला लीजिए।

वैसे हर बंदे की हर दौर की अपनी अपनी सिरदर्दीयां हैं ... मुझे सुबह से यही लग रहा है..

आप इसे देख सकते हैं...  Kohinoor Diamond of India 

 अभी कोहिनूर के नाम से गूगल कर रहा था को १९६० की कोहिनूर हिंदी फिल्म का यह गीत यू-ट्यूब पर दिख गया ...सुनिए अगर पुराने हिंदी फिल्मी गीत आप की पसंद में शुमार हैं...



मन को ना खोल पाना भी सेहत के लिए हानिकारक है ...

अभी महान् कथाकार जसवंत सिंह विरदी और नवतेज सिंह की पंजाबी कहानियां जिन का हिंदी में अनुवाद भी हो चुका है, पढ़ रहा था...बेहद उमदा कहानियां..छोटी छोटी ...६-७ पन्नों की कहानियां...ज़िंदगी से जुड़ी हुईं..किसी भारी भरकम शब्द की वजह से मन उलझ नहीं रहा था...इन महान कथाकारों की कहानियां हमारी स्कूल की किताबों में भी थीं...बहुत कुछ सोचने-समझने पर मजबूर करने वाली बातें...

और हां, एक मित्र ने उस दिन देश की एक बड़ी नामचीन पत्रिका के जून २०१७ अंक में अपनी कहानी छपने की बात बताई थी...ले आया था वह रसाला...लेकिन इतनी भारी भरकम भाषा...इतने कठिन शब्द ...कि मैं दो तीन पन्ने तो पढ़े लेकिन पल्ले कुछ खास पढ़ा नहीं...मैं बीच बीच में यही देख रहा था कि अभी पेंचो कितनी और पड़ी है...बस, चंद मिनटों के बाद नहीं झेल पाया...कठिन भाषा, बड़े बड़े शब्द ...

बचपन में हम लोग कैसे छुट्टियों के दिनों में कॉमिक्स और बाल साहित्य को पढ़ने के लिए आतुर रहते थे ..अगर किराये पर लेकर आते तो देर रात या सुबह जल्दी उठ कर उसे निपटाते क्योंकि किराया भरना होता था भई। लेकिन मित्र की कहानी में वह बात नहीं थी..

उस मित्र ने अपनी फेसबुक पोस्ट में इस बात की सूचना दी थी कि उस की कहानी छप रही है ...उस के नीचे बीसियों टिप्पणीयां ...मेरी भी इच्छा हुई कि एक ईमानदार सी टिप्पणी लिख दूं कि मेरे से पूरी पढ़ी ही नहीं गई....लेकिन हमेशा कि तरह ऐसा करने से रूक गया...

उस दिन एक साथी ने एक बुज़ुर्ग के किसी पंजाबी गीत पर मस्त हो कर झूमने की वीडियो शेयर की...उस बाबे की मस्ती देख कर मन मस्त हो गया और कमैंट कर दिया कि यह तो भई मैं ही हूं आज से २० साल बाद ....कल उसने फिर एक वीडियो शेयर की जिस पर उसने कमैंट लिखा कि मैं भी ऐसा ही कभी जीवन जीना चाहूंगा...उस पर भी मैं कुछ ऐसा लिखना चाहता था जिसे पढ़ कर हंसते हुए पेट में बल पड़ जाते ... और अगर वह मेरे सामने होता तो उसे दो चार धफ्फे मार के अपनी बात कह लेता...ठहाकों ठहाकों में ..मसखरे मौलिये की तरह !

मैंने उस पर चार पांच कमैंट तो किये....लेकिन मुझे पता है कि वे मेरे मन के भाव नहीं प्रगट कर पा रहे थे क्योंकि मैं दिल खोल कर लिखने से डर रहा था ...नहीं लिख पाया जो मैं लिखना चाहता था... दरअसल सोशल मीडिया आमने सामने वार्तालाप करने की जगह कभी भी नहीं लेगा..

जब हम लोग एक दूसरे के सामने बैठ कर गप्पबाज़ी करते हैं ...बिना किसी कारण से ...तो उस दौरान जो आदान-प्रदान होता है वह बेजोड़ होता है ...उस का कोई सानी नहीं...नाराज़गी, खुशी, मनमुटाव का तुरंत हिसाब किताब...पीठ पर धफ्फा मार के, ठहाके मार के, या छोटी मोटी गाली निकाल के ...

और कोई बुरा भी नहीं मनाता ....और जो बुरा मनाने वाला होता है ...वह अपने आप इस टोली से किनारे कर लेता है ...

लेकिन सोशल मीडिया में ऐसा नहीं है ...बहुत बार लगता है कि मैं अपना समय ही बरबाद करता हूं वहां पर .. वैसे तो मैं ज़्यादा समझ किसी वाद-विवाद में उलझता ही नहीं......मेरे में कभी इतनी शक्ति थी ही नहीं कि मैं किसी धर्म, नस्ल या जातिवाद किसी अन्य लफड़े में पड़ूं...न ही रूचि रही कभी ऐसी ( Of course, I do have my own strong personal views, which i prefer to keep to myself or my immediate family!!) ....  फिर भी जब हम लोग आमने सामने होते हैं तो बहुत से बातें कर लेते हैं जिन्हें लिखने में झिझक होती है ...शायद झिझक तो मेरे जैसे बंदे को क्या होनी है, डर को ही मैं झिझक कह रहा हूंगा.. 

आपसी वार्तालाप से हल्केपन का अहसास होता है ....सोशल मीडिया पर इंटलेक्चूएल बने रहने से बोझ बढ़ता है ... ऐसा कैसे हो सकता है कि आप जो कमैंट करें वह पॉलिटिक्ली भी सही है ...किसी को बुरा भी न लगे...सब को अच्छा लगे ..आप की छवि भी चमके....भई, ऐसा काम तो फिर पालिटिक्स वाले ही कर सकते हैं...

इतना घुमा फिरा कर क्यों लिख रहा हूं?.....बात सिर्फ़ इतनी है कि मैं सोशल मीडिया पर अपने आप को पूरी तरह से एक्सप्रेस नहीं कर पाता हूं....किसी की आलोचना नहीं कर पाता ..किसी को बुरा लगेगा...कईं बार चुप्पी साधना भी किसी बात को स्वीकार करने जैसा ही होता है .....

बहुत बार होता है कि कुछ कहने की इच्छा होती है ....लेकिन बीसियों कारणों की वजह से उंगलियों पर ताला लगाना पड़ता है कि बात का बतगंड़ न बन जाए कहीं....ये तो कुछ भी टाइप कर के छूट जायेंगी लेकिन खामियाजा तो मुझे ही भुगतना पड़ेगा.....

ब्लॉग पर अपने आप को एक्सप्रेस करना ज़्यादा आसान है ....लेकिन वहां भी मेरे से कमी तो रह ही जाती है ....मैं उन सब महान लेखकों की कल्पना करते हुए उन के चरणों में नतमस्तक हूं जो बेबाकी से सब कुछ लिख कर छुट्टी करते हैं...स्वयंं भी छूट जाते हैं ... और पाठकों को भी अभिव्यक्ति की आज़ादी का थोड़ा मज़ा चखा जाते हैं....लेकिन उस के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए होती है ....

बस, इस पोस्ट में कुछ कहने को और है नहीं, अपने आप से यही कह रहा हूं कि मन को खोल लिया करो भाई ...कुछ नहीं होगा...इन सब वाट्सएप कंटैक्ट्स और फेसबुकिया मित्रों से क्या पता कभी ज़िंदगी में मिलना भी है कि नहीं, लेकिन यह जो मन की बातें मन में ही दबी रख के (कि किसी को बुरा नहीं लगे) खुल के अपनी बात न कह पाना भी अपनी सेहत के लिए भी हानिकारक है ....जैसे दंगल फिल्म में बच्चियां अपने बापू को सेहत के लिए हानिकारक कहती हैं... 😀😀😀

लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं खुलेपन से सोशल मीडिया पर कभी टहल पाऊंगा....दरअसल कभी किसी को कोई बात बुरी लग जाती है तो आदमी बेकार की बहसबाजी में पड़ जाता है ....and i just hate that!